अगर कोई कानून नहीं टूट रहा, तो घर पर धार्मिक प्रार्थना सभा के लिए मंजूरी की जरूरत नहीं- छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट

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बिलासपुर: छत्तीसगढ़ में घर के अंदर धार्मिक प्रार्थना सभा के आयोजन को लेकर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला दिया है. कोर्ट ने कहा कि अगर कोई कानून नहीं टूट रहा है, तो लोगों को अपने घरों में धार्मिक प्रार्थना सभाएं आयोजित करने के लिए अधिकारियों से पहले से मंज़ूरी लेने की ज़रूरत नहीं है.

जानिए अदालत ने क्या कहा ?

जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की सिंगल बेंच ने यह बात तब कही, जब उन्होंने दो याचिकाकर्ता को पुलिस द्वारा जारी नोटिस रद्द कर दिए. इसके साथ ही अदालत ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे उनके नागरिक अधिकारों में दखल न दें.24 मार्च को दिए गए आदेश के अनुसार, यह मामला जांजगीर-चांपा ज़िले के नवागढ़ पुलिस थाना क्षेत्र के गोधना गांव के दो रिश्तेदारों से जुड़ा है.

याचिकाकर्ता ने पुलिस पर लगाए गंभीर आरोप

याचिकाकर्ता 2016 से अपने घर की पहली मंज़िल पर बने एक हॉल में ईसाई धर्म के मानने वालों के लिए प्रार्थना सभाएं आयोजित करते आ रहे थे.उन्होंने अपनी याचिका में कहा कि इन सभाओं के दौरान कोई गड़बड़ी या गैर-कानूनी गतिविधि न होने के बावजूद भी पुलिस उन्हें सभाएं करने से रोक रही है. याचिकाकर्ता ने कहा कि स्थानीय पुलिस उन्हें ऐसी सभाएं करने से रोकने के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 94 के तहत नोटिस जारी कर रही थी.

याचिकाकर्ता ने कोर्ट से की गुजारिश

याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि 18 अक्टूबर, 2025, 22 नवंबर, 2025 और 1 फरवरी, 2026 को नोटिस दिए गए थे, ताकि उन्हें अपने घर पर प्रार्थना सभाएं करने से रोका जा सके. याचिकाकर्ता ने आगे कहा कि गोधना की ग्राम पंचायत ने पहले इन सभाओं की मंज़ूरी देते हुए एक ‘नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफ़िकेट’ (NOC) जारी किया था, लेकिन बाद में दबाव में आकर उसे वापस ले लिया.राहत मांगते हुए, याचिकाकर्ताओं ने HC से गुज़ारिश की कि वह इन नोटिसों को रद्द कर दे और पुलिस को उनके निजी घर पर प्रार्थना सभाएं करने के उनके अधिकार में दखल देने से रोके.

क्या था सरकारी वकीलों का पक्ष ?

इस याचिका का विरोध करते हुए, डिप्टी गवर्नमेंट एडवोकेट शोभित मिश्रा ने दलील दी कि याचिकाकर्ताओं के ख़िलाफ़ पहले भी आपराधिक मामले दर्ज हो चुके हैं और उन्हें जेल भी जाना पड़ा है.राज्य के वकील ने दलील दी कि याचिकाकर्ताओं ने ऐसी सभाएं आयोजित करने के लिए सक्षम अधिकारियों से पहले से मंज़ूरी नहीं ली थी, जिसके चलते पुलिस को नोटिस जारी करने पड़े.

जानिए कोर्ट ने क्या फैसला दिया ?

HC ने अपने आदेश में कहा कि अगर कोई प्रार्थना सभा बिना किसी कानून का उल्लंघन किए आयोजित की जाती है, तो उसे करने के लिए किसी भी अधिकारी से पहले से मंज़ूरी लेने की ज़रूरत नहीं है. याचिकाकर्ता उन ज़मीनों के रजिस्टर्ड मालिक हैं, जहां वे 2016 से ईसाई धर्म के मानने वालों के लिए प्रार्थना सभा ​​आयोजित करते आ रहे हैं. ऐसा कोई कानून नहीं है जो किसी भी व्यक्ति को अपने घर में प्रार्थना या प्रार्थना सभा आयोजित करने से रोकता हो. इसके अलावा, अगर प्रार्थना या प्रार्थना सभा का आयोजन बिना किसी कानून का उल्लंघन किए किया जाता है, तो इसके लिए किसी भी अधिकारी से पहले से अनुमति लेने की कोई ज़रूरत नहीं है.

हाई कोर्ट ने आगे कहा कि अगर शोर-शराबे से कोई परेशानी होती है या कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ती है, तो अधिकारियों के पास संबंधित कानूनों के प्रावधानों के तहत ज़रूरी कार्रवाई करने का अधिकार हमेशा खुला रहता है. इसलिए पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया जाता है कि वे याचिकाकर्ताओं के नागरिक अधिकारों में दखल न दें और न ही जांच के बहाने उन्हें परेशान करें. इसके साथ ही कोर्ट ने पुलिस की तरफ से जारी नोटिस को रद्द कर दिया.

Amit sahu
Author: Amit sahu

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