चैत्र कृष्ण एकादशी के पावन अवसर पर जन्मी संत कर्माबाई ने भक्ति, सेवा और मानवता के आदर्श से समाज को दी नई दिशा
रायगढ़। भारतीय संत परंपरा में भक्ति, करुणा और निस्वार्थ सेवा की प्रतीक मानी जाने वाली भक्त शिरोमणि संत माता कर्माबाई की 1009वीं जयंती आज श्रद्धा और आस्था के साथ मनाई जा रही है। समाज के विभिन्न संगठनों और श्रद्धालुओं द्वारा घर-घर में पूजा-अर्चना, दीप प्रज्वलन तथा महाप्रसाद खिचड़ी का भोग लगाकर भक्तमाता कर्मा को श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जा रहा है।
ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार संत कर्माबाई का जन्म लगभग एक हजार नौ वर्ष पूर्व चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी (पापमोचनी एकादशी) को विक्रम संवत 1073 में झांसी (उत्तर प्रदेश) में एक प्रतिष्ठित तेल व्यापारी परिवार में हुआ था। उनके पिता श्री रामशाह जी धार्मिक प्रवृत्ति के दयालु और समाजसेवी व्यक्ति थे। जन्म के समय विद्वान पंडितों ने उनकी जन्मपत्री देखकर भविष्यवाणी की थी कि यह बालिका भविष्य में महान भक्त के रूप में विख्यात होगी।
बाल्यकाल से ही धार्मिक संस्कारों की ओर झुकाव, भक्ति और भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अटूट आस्था
बाल्यकाल से ही कर्माबाई को धार्मिक कथाओं, भजन-कीर्तन और भगवान की आराधना में विशेष रुचि थी। समय के साथ उनका यह भक्ति भाव और अधिक प्रबल होता गया। विवाह योग्य होने पर उनका विवाह नरवर ग्राम के एक प्रतिष्ठित व्यापारी परिवार में हुआ।
गृहस्थ जीवन में भी वे अपने पारिवारिक कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए शेष समय भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति, भजन और ध्यान में लगाती थीं। कहा जाता है कि उनकी निस्वार्थ भक्ति और ईश्वर में अटूट विश्वास ने उन्हें आध्यात्मिक ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
नरवर में अन्याय के विरुद्ध प्रार्थना और ईश्वरीय कृपा का चमत्कार बना जनश्रुति
नरवर में उनके जीवन से जुड़ी एक घटना आज भी लोकमान्यता के रूप में सुनाई जाती है। बताया जाता है कि उस समय राजा के हाथी को गंभीर खुजली रोग हो गया था और उपचार के लिए तेल से भरे कुंड में स्नान कराने का आदेश दिया गया। इसके लिए राज्य के सभी तेल व्यापारियों को बिना मूल्य तेल देने का आदेश दिया गया, जिससे गरीब तेलकारों पर भारी संकट आ गया।
इस अन्याय से व्यथित कर्माबाई ने भगवान श्रीकृष्ण से करुण प्रार्थना की। मान्यता है कि अगले ही दिन वह कुंड तेल से भर गया और राजा को अपनी भूल का एहसास हुआ। इस घटना के बाद कर्माबाई की भक्ति और करुणा की चर्चा दूर-दूर तक फैल गई।
पति के निधन के बाद भी नहीं टूटा विश्वास, विपरीत परिस्थितियों में भी ईश्वर भक्ति बनी जीवन का आधार
जीवन में अनेक कठिनाइयों का सामना करने के बावजूद कर्माबाई की भक्ति अडिग रही। पति के निधन के बाद भी उन्होंने अपने दोनों पुत्रों के पालन-पोषण के साथ ईश्वर आराधना को जीवन का आधार बनाए रखा।
समय बीतने के साथ उनके मन में भगवान के साक्षात दर्शन की तीव्र इच्छा जागृत हुई। कहा जाता है कि इसी भाव से प्रेरित होकर वे एक दिन घर से निकलकर जगन्नाथपुरी की ओर चल पड़ीं और अनेक कठिनाइयों के बीच प्रभु के दरबार तक पहुंचीं।
जगन्नाथपुरी में खिचड़ी भोग की कथा और ‘जगन्नाथ का भात-जगत पसारे हाथ’ कहावत की उत्पत्ति
लोकपरंपरा के अनुसार जगन्नाथपुरी पहुंचकर कर्माबाई ने भगवान को भोग लगाने के लिए साधारण खिचड़ी बनाई। प्रारंभ में मंदिर के पुजारियों ने उन्हें भोग चढ़ाने से रोक दिया, किंतु उनकी सच्ची भक्ति और समर्पण के कारण भगवान स्वयं उनके पास आए और खिचड़ी का भोग स्वीकार किया।
कहा जाता है कि अगले दिन मंदिर में भगवान के मुख पर खिचड़ी के चिन्ह देखकर इस घटना का रहस्य सामने आया। इसके बाद से भगवान जगन्नाथ को खिचड़ी का भोग लगाने की परंपरा प्रारंभ हुई और यह प्रसाद “महाप्रसाद” के रूप में प्रसिद्ध हुआ। इसी घटना से प्रसिद्ध कहावत “जगन्नाथ का भात-जगत पसारे हाथ” प्रचलित हुई।
देशभर में श्रद्धापूर्वक मनाई जाती है जयंती, घर-घर में दीप प्रज्वलन और खिचड़ी प्रसाद का आयोजन
भक्तमाता कर्माबाई की जयंती के अवसर पर समाज के लोग अपने घरों में रंगोली बनाकर कलश स्थापना करते हैं और पांच दीप जलाकर पूजा-अर्चना करते हैं। भगवान को खिचड़ी का भोग लगाकर प्रसाद के रूप में वितरण किया जाता है तथा परिवार और समाज के साथ सामूहिक आरती कर भक्तमाता को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है।
समाज के वरिष्ठजनों का मानना है कि संत कर्माबाई का जीवन त्याग, सेवा, करुणा और अटूट भक्ति का प्रेरणास्रोत है। उनका संदेश आज भी समाज को मानवता, समर्पण और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

नेतराम साहू
व्याख्याता (रसायन) शा उ मा वि तरकेला
सह संयोजक, छग प्रदेश साहू संघ कर्मचारी-अधिकारी प्रकोष्ठ छत्तीसगढ़ (पं.क्र.33/61)
आजीवन सदस्य, अखिल भारतीय तैलिक साहू महा सभा दिल्ली,भारत 9691721820
















































