हाइड्रो प्रोजेक्ट पर गंभीर सवाल: संरक्षित वन क्षेत्र में 33 केवी लाइन बिछाने में नियमों की अनदेखी के आरोप

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रायगढ़। रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ ब्लॉक में संचालित धनवादा पावर एंड इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड के हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि कंपनी ने प्रोटेक्टेड फॉरेस्ट एरिया में कार्य किया, जबकि एनओसी राजस्व वन क्षेत्र के नाम पर ली गई। मामले में विभागीय मिलीभगत और नियमों की अनदेखी के आरोप भी सामने आए हैं।

संरक्षित वन क्षेत्र में काम, एनओसी राजस्व वन की

जानकारी के अनुसार मांड नदी पर स्थापित इस हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट की योजना कांग्रेस शासनकाल में बनी थी। आरोप है कि कंपनी ने एनओसी लेने के दौरान गलत तथ्यों को प्रस्तुत किया और संबंधित विभागों से अनुमति हासिल कर ली।

कंपनी ने भालूपखना, रैरूमाखुर्द और चरखापारा क्षेत्र में 33 केवी ट्रांसमिशन लाइन बिछाने के लिए तत्कालीन कलेक्टर से अनुमति मांगी थी। इन गांवों की कुल 2.510 हेक्टेयर भूमि के लिए एनओसी भी जारी कर दी गई।


वन विभाग की प्रक्रिया पूरी किए बिना शुरू किया निर्माण

एनओसी देते समय कलेक्टर ने स्पष्ट शर्त रखी थी कि यदि वन विभाग द्वारा भू-प्रत्यावर्तन की प्रक्रिया की जाती है तो प्रशासन को कोई आपत्ति नहीं होगी। आरोप है कि कंपनी ने वन विभाग से आवश्यक प्रक्रिया पूरी किए बिना ही निर्माण कार्य शुरू कर दिया।

इससे सवाल उठ रहे हैं कि आखिर बिना पूर्ण अनुमति के निर्माण कार्य कैसे शुरू हुआ।


बिजली विभाग पर भी सवाल

मामले में छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (CSPDCL) के अधिकारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। आरोप है कि कंपनी को लाभ पहुंचाने के लिए विभाग ने वन विभाग को पत्र लिखकर क्षेत्र में नए बिजली खंभे लगाने की आवश्यकता बताई।

खंभे लगाए जाने के बाद इन्हें कथित रूप से धनवादा पावर को सौंप दिया गया, जिसके बाद कंपनी ने अपनी 33 केवी लाइन के केबल खींच लिए।


अंडरग्राउंड केबल का नियम तोड़ा?

8 जून 2023 के राजपत्र में प्रकाशित प्रावधानों के अनुसार, संरक्षित क्षेत्र (Protected Area) में 33 केवी या उससे कम वोल्टेज की बिजली लाइनों को अंडरग्राउंड केबल, एबी केबल या कवर्ड कंडक्टर के माध्यम से स्थापित किया जाना चाहिए।

CSPDCL रायपुर कार्यालय द्वारा जारी पत्र में भी स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि वन विभाग की सलाह लेकर ऐसी लाइनों को भूमिगत किया जाए।

इसके बावजूद यदि खुले तौर पर लाइन बिछाई गई है, तो यह नियमों के उल्लंघन का मामला बन सकता है।


जांच की मांग तेज

पूरा मामला अब प्रशासनिक पारदर्शिता, वन संरक्षण और विभागीय जवाबदेही से जुड़ा बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। क्षेत्र में यह मांग तेज हो रही है कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित कंपनी की भूमिका स्पष्ट की जाए।

Amit sahu
Author: Amit sahu

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