रायपुर। नवरात्र में लाखों अखंड ज्योति से जगमगा उठते हैं छत्तीसगढ़ के मंदिर। बमलेश्वरी, दंतेश्वरी, महामाया, चंद्रहासिनी सहित अनेक मंदिरों में निभाई जाती है अनोखी परंपरा, यह आस्था, अनुशासन और सामुदायिक शक्ति का है जीवंत दीपोत्सव।
शक्तिपीठों में अखंड ज्योत का अलौकिक दृश्य
गांवों के छोटे-छोटे देवी स्थानों से लेकर डोंगरगढ़ की पहाड़ियों, दंतेवाड़ा के प्राचीन शक्तिपीठ और रतनपुर के ऐतिहासिक मंदिरों तक अखंड ज्योत का जो अलौकिक दृश्य बनता है, वह केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं, बल्कि लोकजीवन, सामाजिक सहभागिता और अनुशासन का अद्भुत संगम होता है।
वैदिक और पौराणिक परंपराओं का संगम
आंचलिक इतिहास के जानकार इस परंपरा की शुरुआत को वैदिक अग्नि उपासना, पौराणिक शक्ति परंपरा और आदिवासी जीवन पद्धति के सम्मिलन के रूप में देखते हैं, जहां अग्नि को शुद्धता, ऊर्जा और साक्षात देवी शक्ति का प्रतीक माना गया। कौन किसके लिए प्रेरक बना, यह तय करना कठिन है, परंतु ज्योत से ज्योत जली और अब पूरे प्रदेश की परंपरा है।
सामुदायिक एकता और समानता का प्रतीक
यह व्यक्तिगत धार्मिक मान्यता के साथ ही सामुदायिक और सामाजिक भागीदारी का प्रतीक है। यह मनोकामना की ज्योत है। मंदिरों में जगमगाते मिट्टी के ज्योतों में अमीर-गरीब, ऊंच-नीच, अगड़ा-पिछड़ा, अपना-पराया जैसा कोई भेद नहीं है।














































